राष्ट्रकिंकर (साप्ताहिक दैनिक ) में एक लेख पढ़ा की यह गणतंत्र की सफलता है या कुछ और फैसला करना मुश्किल हो रहा है । आखिर राजनीति का आकर्षण दिनों-दिन क्यों बढ़ता जा रहा है। नेताओं का साम्राज्य दिन दुगनी-रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। चुनाव महंगा कर्मकांड बनते जा रहे हैं जबकि चुनाव आयोग लगातार सख्ती का ढिंढ़ोरा पीट रहा है। क्या मूर्तियां स्थापित होते देखते रहना और ऐन चुनाव के वक्त उन्हे ढकने का आदेश गण की खून-पसीने की कमाई का दुरुपयोग नहीं है? और हां, चुनाव के बाद मूर्तियों से कपड़ा हटाने का खर्च भी होगा, उसकी चिंता भी तो जनता को ही करनी है. तम्बाखू - शराब के license धड़ा धड़ दिए जाते हैं और जब लोग पी पी कर बीमार पड़ते हैं या मरते हैं तो उनके पैसे से ही cancer research institute , counselors , नशा रोको अभियान चलाया जाता है , नशा मुक्ति केंद्र खोले जाते हैं ....जिनको खाने के लिए अन्न नहीं है उन्हें सुनहरे भविष्य के सपने दिखाए जाते हैं ...वाह रे गणतंत्र.... १९४७ में जनसँख्या तक़रीबन ३५ करोड़ थी तो गरीबों की संख्या ४ करोड़ (सरकारी आंकड़े) ) अब सवा करोड़ (१२१ करोड़ ) जनसँख्या तो गरीबों की संख्या ८४ करोड़ (सरकारी आंकड़े) , ये किसी भी तरीके से संतुलित नहीं लगता, यहाँ दीगर है की सरकार ने पैसे खर्च करने में कोई कोताही नहीं बरती (मात्र कागजों पे) आखिर ११ पञ्च वर्षीय योजनायें बना डाली अरबों - खरबों रूपये खर्च हो गए लेकिन human development index में 119 वाँ नंबर आता हैं , प्रधानमंत्री जी कहते हैं कुपोषण रास्ट्रीय शर्म की बात है लेकिन क्या क्या गिनाएंगे ....खैर गण का तंत्र बने इसी आशा में .................
Sunday, January 29, 2012
Wednesday, January 25, 2012
क्रांति की शुरुआत
जब भ्रस्टाचार अपने चरम पे होता है तो वहां फिर बदलाव की चिंगारी भड़कना शुरू हो जाती है जैसे फ़्रांस में, रूस में, जापान आदि में ......व्यवस्था परिवर्तन के लिए तख्ता पलट हुआ यानि सत्ता परिवर्तन ....कमोवेश भारत में भी ऐसी ही स्थितियां बन रही हैं , बस वक़्त का तकाजा है, परन्तु क्रांति का आगाज हो चुका है .....
Subscribe to:
Comments (Atom)